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Showing posts from August, 2020

महाराजा सुहेलदेव राजभर

भारशिव नागवंश सम्राट महाराजा सुहेलदेव राजभर 11सदी के प्रारंभिक काल मे भारत मे एक घटना घटी जिसके नायक श्रावस्ती सम्राट वीर सुहेलदेव भर क्षत्रिय थे ! राष्ट्रवादियों पर लिखा हुआ कोई भी साहित्य तब तक पूर्ण नहीं कहलाएगा जब तक उसमे राष्ट्रवीर श्रावस्ती सम्राट वीर सुहलदेव राजभर की वीर गाथा शामिल न हो | कहानियों के अनुसार वे सुहलदेव , सकर्देव , सुहिर्दाध्वाज राय, सुहृद देव, सुह्रिदिल , सुसज , शहर्देव , सहर्देव , सुहाह्ल्देव , सुहिल्देव और सुहेलदेव जैसे कई नामों से जाने जाते है ! श्रावस्ती सम्राट वीर सुहलदेव राजभर का जन्म बसंत पंचमी सन् १००९ ई. मे हुआ था | इनके पिता का नाम बिहारीमल एवं माता का नाम जयलक्ष्मी था ! सुहलदेव राजभर के तीन भाई और एक बहन थी बिहारीमल के संतानों का विवरण इस प्रकार है ! १. सुहलदेव २. रुद्र्मल ३. बागमल ४. सहारमल या भूराय्देव तथा पुत्री अंबे देवी ! सुहलदेव की शिक्षा-दीक्षा योग्य गुरुजनों के द्वारा संपन्न हुई ! अपने पिता बिहारीमल एवं राज्य के योग्य युद्ध कौशल विज्ञो की देखरेख मे सुहलदेव ने युद्ध कौशल , घुड़सवारी, आदि की शिक्षा ली ! सुहलदेव की बहुमुखी प्रतिभा एवं लोकप्रियता क...

Bhar Kshatriya sulltanpur

 "जनपद सुल्तानपुर के भर /राजभर/भार शिव/  नागवंशी राजाओं की सूची                                1:-महाराजा नन्द कुँवर राय(1292)!1301ई )-सुल्तानपुर (अवध गजेटियर (1877)वैलूम तीन पेज 432 )            2:-महाराजा ईश (1302---1327ई )इसौली सुल्तानपुर (अवध गजेटियर (1877)बै .दो पेज 91)                         3:- भर राजा अल्देव राय व मल्लदे राय (1432---1457ई )अल्देमऊ तहसील .कादीपुर (अवध गजेटियर (1877)वैलूम एक पेज 24)      4:- भर राजा तिलोई उर्फ त्रिलोकी ,कान्हपुरवा सुल्तानपुर (अवध गजेटियर (1877)वैलूम तीन pej45 5:-भर राजा गरहा ,ग्राम , गढ़ा (कुड्वार शहर के पश्चिम गोमती नदी के तट पर )(सुल्तानपुर इतिहास की झलक पेज 77le.रामेश्वर सिंह )          6:- भर राजा हेल , कुशभवनपुर एवं धोपाप तहसील कदीपुर (अवध गजेटियर (1877)वैलूम तीन पेज 432) 7:-भर राजा कूड़े (12वी शदी )कूड़वार सुल्ता...

Bhar Kshatriya

 जनपद जौनपुर के भर /राजभर राजाओं की सूची """""bharsiva  """'""""""'"'''''''''''''''"'''''' 1:-भर राजा घीसू (घिसवा , मछली शहर  (भर /राजभर सम्राज्य 172ले .एम बी राजभर एवं जौनपुर का गौरवशाली इतिहास ले .सत्य नरायन दुबे )     2  :-भर राजा कारुवीर (1528ई )पड़री .जौनपुर (क्षत्रिय वंशार्ड्व पेज 365ले सूबेदार भगवानदीन सिंह)            3:-भर राजा गोपाल ()गढ़ा गोपालपुर पील्कीछा घाट .गोमती नदी पर (अवध विलीनीकरण के पूर्व पेज 22ले .कृष्ण कांत )          4: भर राजा केरार बीर ( )जौनपुर का किला ले(.जौनपुर जिला गजेटियर पेज 14))           5:-भर राजा गरकदेव (11वी शदी )टीकरी का किला .टिकरी .शाहगंज (नागभारशिव का इतिहास पेज 134ले .एम बी राजभर )                    6:-भर राजा मोती (1553ई )सिंघावली जौनपुर (क्षत्रिय वंशारणव  पेज 378ले सूबेदार भगवानदीन सिंह        7:-भर राजा बरसाती  .बरसठी .जौनपुर से इलाहाबाद मार्ग पर (...

बुंदेलखंड का सोमनाथ मंदिर

  सोमनाथ मंदिर: अतीत की यात्रा का सुंदर, आकर्षक, दुखद प्रसंग यह बात तेरह दिसंबर, 2010 की है। मैं अपने अभिन्न मित्र राकेश कुमार गौतम 'मेजर' के साथ चित्रकूट में घूम रहा था। घूमते-घूमते बात बुंदेलखंड में शैव मत के विस्तार और उसके प्रमुख केंद्रों तक पहुंच गई। दरअसल, मुझको बसारी (मध्य प्रदेश) में होने वाले बुंदेली उत्सव -2010 की स्मारिका के लिए एक अन्य लेआउट लिखें। इस ग्राफ़ का विषय तलाशते-तलाशते दिमाग में आया कि क्यों न बुंदेलखंड में फैले शैव मत के ऊपर कोई ग्राफ लिखा जाएगा। बातों के दौरान ही मेरे मित्र राकेश ने बताया कि कर्वी से मानिकपुर मार्ग पर स्थित चर गांव में एक शिव मंदिर है, जिसे सोमनाथ मंदिर कहा जाता है। राकेश ने बताया कि मैं भी वहां नहीं गया हूं, लेकिन उस मंदिर के बारे में सुनकर अक्सर इच्छा होती है कि वहां जाएं। बुंदेलखंड में सोमनाथ, नाम सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। यह सच है कि शिवभक्त राजा, शासक या धर्मार्थु लोग अपने नाम के साथ 'नाथ' या 'ईश्वर' जोदकर शिवमंदिर का निर्माण कराया करते थे, किंतु सोमनाथ का नाम प्राथमिकता: गुजरात के प्रभासपत्तन नामक स्थान पर चालुक्य शा...

भार शिव राजा नंद कुवर सुलतानपुर

: भर राजा नंद कुँवर (१२ ९ १-१३०१) सुल्तानपुर ********************* वर्तमान सुल्तानपुर शहर का प्राचीन नाम कुश स्थली (वायुपुरान pej26) था। कनिहुम ए। जया .अई। पृष्ठ 459 के अनुसार भगवान श्री राम के पुत्र कुश की यहाँ राजधानी होने के कारण इस शहर का नाम कुश भवन या कुश स्थली या कुशपुर कहा जाने लगा। लेकिन यह एक विवादित विषय है। मुनजल गजेटियर वेलूम एक पृष्ठ 38 के अनुसार वायु पुरान में लिखा है कि राम चन्द्र के पुत्र कुश कौशल देश में विंध्य पर्वत पर कुश स्थली या कुशवती नाम की राजधानी में राज्य करते थे। (सन्धर्व ग्रथ -अयोध्या का इतिहास पृष्ठ 4 ले, अवध वाशी लाला सीताराम से उधृत) कालीदास कृत रघुवंश सर्ग 16 के अनुसार कुश को अयोध्या जाते समय विंध्य गिरी। पार करना पड़ता था और गंगा नदी को भी पार करने से पड़ा था।] कुश का। राज्य दछछिन कौशल, जिसकी राजधानी कुशावती थी, वह विंध्याचल पर्वत के तट पर स्थित था। यह राज्य उन्हें ननिहाल से मिला था क्योंकि कौशील्या यहां की राजकुमारी थी। कोई भी द्वारिका को और कुछ लोग पंजाब के कसूर को भी कुशावती मानते हैं। (संदर्भ ग्रन्थ -अयोध्या का इतिहास पेज 77 ले, अवधवासी लाला सीतारा...

महाराज रानी राजवंती और धनराजी

 महारानी राजवन्ती और रानी धनराजी ॥ 17वी शदी ॥ ग्राम .परगना व तहसील धौरहरा जि .लखीमपुर                                    धौरहरा शहर जनपद लखीमपुर में नानपारा से लखीमपुर रोड पर घाघरा और शारदा नदी के मध्य स्थित ग्राम सिसई कला से निघासन मार्ग पर लगभग 15k.m.पर पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित है । धौरहरा शहर के उत्तर ग्राम गोरखपुर दक्छिन बसंतपुर पूरब नूरपुर और पश्चिम शाहपुर स्थित है । ग्रंथ .अवध के तलूकेदार पेज 242ले .पवन बक्शी के अनुसार जहांगीर के शासन काल 1605से 1627के मध्य दो भर रानियां धौरहरा में रहती थी । किसी युद्ध में अपने पति के शहीद हो जाने के कारण बड़ी रानी राजवन्ती ही शासन का देखभाल कर रही थी । ये दोनों रानियां महारानी बल्लरी देवी w! oसुहेलदेव और महारानी कुन्तमा w.o महराजा बारा के पदचिन्हों पर चलकर अपने शासन का देख रेख करती थी । ये दोनों रानियां जीवन पर्यन्त किसी भी पड़ोसी दुश्मन के दबाव में नहीँ आयीं । जब भी विषम परिस्थितियों उत्पन्न हुयी दोनों रानियों ने शस्त्र लेकर अपने भर सैनिको के साथ युध्द...

भार शिव सम्राट महाराजा दीपचंद

 भार शिव नागवंश सम्राट भर राजा दीपचंद (15 वी। शदी) बहराइच बौंडि  जाने के लिए बहिराईच से रामपुरवा चौकी और रामपुरवा चौकी से बौंदि के लिया मार्ग है। बौंडि के उत्तर रतनपुर दक्छिन सिलौता ।पश्चिम गूघरा नदी और पूरब रेहू खास मार्ग है। पहले राजा का किला बम्हनौटी मेँ था। बाढ़ मेँ नदी मेँ विलीन हो गई और उसला बौंडि बनवाया गया था। यहाँ जाने के लिए दूसरे मार्ग परवल से निकासीाइ मार्ग पर जलालपुर से बौंडि के लिया मार्ग जाता है। 15 वी शदी (1414 ई) में रैका कश्मीर से सूर्यवंशी रैकवार प्रताप शाह और दुन्हड़ी शाह दो भाई भर राजा रामनगर बाराबंकी के यहाँ आए। (सन्थ्रभ बाराबंकी गजेटियर (1964) पृष्ठ 28 ले। ईसा बसंती जोशी व निकासीाइ गजेटियर 1921 पृष्ठ 123, १० ले। प्रताप शाह के सालदेव और बालदेव दो लड़के थे। प्रताप शाह के मृत्यु के पश्चात सालदेव और बलदेव अपने चाचा दुन्ध शाह के साथ भर राजा के यहां नौकरी करने लगे। उस समय रामनगर का राजा बहुत ही शक्तिशाली था। भगाइच जनपद में स्थित बमनौटी जिसको वर्तमान में बौंडि कहते हैं का भर राजा दीपचंद रामनगर के भर राजा के अधीन था। (संदर्भ: -भराइच जनपदों का खोजपूर्ण इतिहास पृष...

राजभर राजा इंद्र

भर राजा इन्द्र। 11 वी  सदी  इन्द्रपुर भीरा, स्वसी, मऊ, जनपद मऊ के तहसील वैसी के द्छिन पश्चिम दिशा में घोसी से मुहम्मदाबाद मार्ग पर सीवटी तिराहा और सीतात्मक से फेटी मार्ग पर रेतीरिडिह के आगे फत्तेपुर की जा रही सड़क के किनारे छोटी सरजू नदी है। । दाढ़ी तट पर स्थित हैं। भीरा स्थित हैं। इन्द्रपुर के पश्चिम ँद्वापट्टी दक्छिन फत्तेपुर ताल, पूरब भैरोपुर और उत्तर छोटी नदी सरजू स्थित है। इन्द्रपुर भीरा 10 वी सदी से 14 वी सदी के मध्य कालका शासन रहा है। इन्द्रपुर भी प्राचीन काल से ही कृषि की राजधनी रही है। संत का इन्द्रपुर भीरा नामक उसला लगभग 30 एकड़ भूभाग पर विस्तृत था। इसकी स्थापना भर राजा इन्द्र ने 10 वी से 11 वी सदी के मध्य किया था। इन्होनेन्डर्ट्स के चतुर्दिक नगर रिसॉर्ट्स । का निर्माण किया गया था।   भर राजा इन्द्र के नाम पर ही इस स्थान का नाम इन्द्रपूर पड़ा। कलानार में इसका नाम भीरमतीह पड़ा। भीरतीस के पूर्वाब में चेरूओ का शासन था। इस किले पर कभी भर राजा वसश का भी शासन रहा है। इस किले के चतुर्दिक क्षेत्र में भर, रज्भरौ की बहुलता है। यद्यपि यह उसला विभाग द्वारा संरक्षित है, फिर ...