: भर राजा नंद कुँवर (१२ ९ १-१३०१) सुल्तानपुर ********************* वर्तमान सुल्तानपुर शहर का प्राचीन नाम कुश स्थली (वायुपुरान pej26) था। कनिहुम ए। जया .अई। पृष्ठ 459 के अनुसार भगवान श्री राम के पुत्र कुश की यहाँ राजधानी होने के कारण इस शहर का नाम कुश भवन या कुश स्थली या कुशपुर कहा जाने लगा। लेकिन यह एक विवादित विषय है। मुनजल गजेटियर वेलूम एक पृष्ठ 38 के अनुसार वायु पुरान में लिखा है कि राम चन्द्र के पुत्र कुश कौशल देश में विंध्य पर्वत पर कुश स्थली या कुशवती नाम की राजधानी में राज्य करते थे। (सन्धर्व ग्रथ -अयोध्या का इतिहास पृष्ठ 4 ले, अवध वाशी लाला सीताराम से उधृत) कालीदास कृत रघुवंश सर्ग 16 के अनुसार कुश को अयोध्या जाते समय विंध्य गिरी। पार करना पड़ता था और गंगा नदी को भी पार करने से पड़ा था।] कुश का। राज्य दछछिन कौशल, जिसकी राजधानी कुशावती थी,वह विंध्याचल पर्वत के तट पर स्थित था। यह राज्य उन्हें ननिहाल से मिला था क्योंकि कौशील्या यहां की राजकुमारी थी। कोई भी द्वारिका को और कुछ लोग पंजाब के कसूर को भी कुशावती मानते हैं। (संदर्भ ग्रन्थ -अयोध्या का इतिहास पेज 77 ले, अवधवासी लाला सीताराम) * सुलझे भाईयों में आपसी तकरारके डर से अयोध्या उजाड़ दी गयी थी। लेकिन सभी भाइयों ने कहा कि कुश को सम्राट माना और कुश ने अयोध्या को पुनः बसाया। (संदर्भ -उपरोक्त) कहते हैं कि यह प्राचीन नगर राम के पुत्र कुश के द्वारा बसाया गया था और यहां कुश ने यहां एक विशाल भवन का निर्माण करवाया था। श्री राम के पुत्र कुश का भवन होने के कारण इस नगर का नाम कुशभवनपुर या कूश्मूर पड़ा। लेकिन राजधानी अयोध्या ही थी। क्रॉनिकल आफ उन्नाव पेज 27 ले,इलियट के अनुसार सूर्यवंशियों के पतन के बाद अबध के पूर्वाब में चेरू पश्चिम में भर का शासन हो गया था। कुशभवनपुर पर भर वंश के राजा (लोकगुरुओ में भर राजा भरत) का शासन हुआ। भर राजा ने कुशभवनपुर का : पुनरूत्थान कराकर अपनी राजधानी घोषित की और कुशभवनपुर का नाम बदलकर अपने नाम पर भर्तीपुर रक्खा। (संदर्भ -द भर आफ अवध और बनारस ले, पी सरनेगी) भर राजा भरत ने कुशभवनपुर का नाम बदलकर भरतपुर पुनः भरतीपुर कर दिया। सरकारी अभिलेखों में भरतीपुर लिखा जाने लगा था। हालांकि हिंदू धर्म में असीम श्रध्दा रखने वाला हिंदू समाज आम बोलचाल में इस नगर को कुशभवन पुर ही कहता था। उस समय बैसडब और शैव परिवर्तनवलंबियों में पूर्ववर्ती: वैचारिक अंतर रहता था। और कभीकभी तीक्ष्ण नोक झोंक भी हो जाता था। ये भर शासक शैव थे।इसीलिए वे भारशिव भी कहे जाते थे। जब शिव ही उदार थे तो भला भारशिव तो उनके परम भक्त थे वे उदार क्यों न होँ? यही उदारता भारशिवो के पतन का कारण बना। जदपि भर जाति सबसे अधिक जाति जाति थी। फिरभी पश्चिमी राजपूतों ने अपनी उदारता का भरपूर लाभ उठाया। डेवलपर पहले कयी राजपूत भर राजा के यहाँ आए और उनके लिए यह नौकरी की और मेरा मौका पाते ही उनकी कटल द्वारा उनके अधिकार के स्वामी के पास गए हैं।
इस प्रकार इस शहर ने नामकरण के मामले में कुशभवनपुर से भरतीपुर और पुनः भरतीपुर से सुल्तानपुर तक का सफर तय किया। भर जाति एक लड़ाकू जाति थी। देश, धर्म, संस्कृति और रक्षार्थ हमेशा आत्म बलिदान देने को तैयार रहेते थे। महमूद गजनवी के समय से ही मुस्लिम आक्रांताओं की नजर अवध क्षेत्र के भर राजाओं को उखाड़ फेकने की थी। हालांकि भरने वाले सैनिकों का शौर्य व पराक्रम और भर राजाओं के चातुर्य, दृढ़ता से संचालन के सामने उनकी एक न चलती रही। सन 1033 ई में सैयद सालार मसूद गाजी ने अपने 5 सिपहसालारों को भर राजा शिवेंद्र (कुशभवनपुर) को परास्त करके
उन्हें गांव के वृध्दजन परिवार की बस्ती या कोट कहते हैं। इस तरह जनपद के चतुर्दिक भरेधीकरण व संस्कृति के अवशेष आज भी प्राप्त होते हैं। कन्नौज के अवसान के उपरांत भर अवध में शासक के रूप में स्थापित हो चुके थे। (संदर्भ ग्रन्थ: -सुल्तानपुर के इतिहास की झलक: 23 लेखक राजेश्वर सिंह) भर राजा नंद कुँवर का पतन "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" यू पी जिला गजेटियर सुल्तानपुर (1982) pej-27 लेखक द एकीकरण प्रसाद वरुण के अनुसार 13 वी से 14 वी के मध्य कुशभवनपुर पर भर राजा नंद कुँवर का शासन था। उनके कई सामंत राजा थे। भर राजा नन्द कुँवर का महल बहुत बड़ा था। राज परिवार के पास लगभग 80154 बीघा भूमि थी, जिसकी खेती होती थी।(अबुल फजल) भर राजा की बारादरी के विशाल जाल और दछछिन छोरों पर लगभग 700 वर्ष पुराना का किला जीर्ण शीर्ण अवस्थाओं में आज भी देखा जा सकता है। गोमती नदी के बांए तट पर भारत की राजधानी का बादशाही कुँआ और भर राजा के राजधानी पर बने पाँचो पीरन की मजार आज भी देखी जा सकती हैं। यहाँ के किले के ध्वंस अवशेषों के गौरवशाली अतीत के गवाह हैं। यद्पि भर राजा नन्दकुँवर बहुत ही शक्तिशाली शासक थे। लेकिन उनकी एक चूक ने उनके शासन का तहस नहस कर दिया। सुल्तानपुर शहर के मध्य बहती गोमती नदी के दो तट पर सीता कुंड और तट पर पांचो पीरन की मजार और मस्जिद बनी हुई है। पांचो पीरन की मजार 13 वी शदी के बनवाए हुए बताए जाते हैं। यहाँ प्रति वर्ष चादर चढ़ाए जाते हैं।अगर यह पांचो पीरन की मजार 13 वी शदी के बने हैं तो रूप निश्चित रूप से यह मजार मोहम्मद गौरी (1194 ई) के शासन काल के नहीं बल्कि अल्लाउद्दीन खिलजी के शासन काल में बनवाए गए हैं। गोमती नदी के तट पर भर राजा नंदकुँवर के शासनकाल का बना विशाल। कुँआ जौ भूमि के ऊपर लगभग 18 फुट ऊँचा और शेष भूमि के नीचे है। यह कुँआ आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पांचो पीरन के मजार पर हर साल नाग पंचमी के बाद सावन मास में 3 दिव्य सावन मेले का आयोजन 14 वी शदी में सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी और भर राजा नंद कुँवर के बीच संघर्ष की याद दिलाता है। अवध गजेटियर (1877) वेलुम तीन पृष्ठ 474, यू पी डिस्ट्रिक्ट गजेटियर सुल्तानपुर (1982 ई) पृष्ठ 27 लेखक द एकीकरण प्रसाद वरुण ,, सुल्तानपुर के इतिहास की झलक पृष्ठ 28 लेखक राम सिंह और मध्यभारत में सुल्तानपुर छेत्र का इतिहास पेज 32,33, 34, 69,70,217 लेखक राजेश कुमार शुक्ला के अनुसार भर राजा नंद कुँवर और दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्द का कारण और भर राजा नंद कुँवर के पतन के घटना का उल्लेख इस प्रकार किया है। :::::: --- दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी के शासनकाल (1296 से 1316 ई) में 2 भाई (सैयद मुहम्मद और सैयद अल्लाउद्दीन) जो घोड़े के निशान थे, पूर्वी अवध। कुशभवनपुर के भार राजा नंद कुँवर से घोड़े पट्टने की पेशकश की। भर राजा नंद कुँवर ने दोनों व्यापारियों की हत्या करवाकर घोड़ों को जप्त करवा लिया। (संदर्भ ग्रन्थ: _सुल्तानपुर जिला गजेटियर (1982 ई) पृष्ठ 27 लेखक डी। पी। वरुण) पूर्वी अवध में आया था। कुशभवनपुर के भार राजा नंद कुँवर से घोड़े पट्टने की पेशकश की। भर राजा नंद कुँवर ने दोनों व्यापारियों की हत्या करवाकर घोड़ों को जप्त करवा लिया।(संदर्भ ग्रन्थ: _सुल्तानपुर जिला गजेटियर (1982 ई) पृष्ठ 27 लेखक डी। पी। वरुण) पूर्वी अवध में आया था। कुशभवनपुर के भार राजा नंद कुँवर से घोड़े पट्टने की पेशकश की। भर राजा नंद कुँवर ने दोनों व्यापारियों की हत्या करवाकर घोड़ों को जप्त करवा लिया। (संदर्भ ग्रन्थ: _सुल्तानपुर जिला गजेटियर (1982 ई) पृष्ठ 27 लेखक डी। पी। वरुण
- क्योंकि सन 1033 ई में सैयद सालार मसूद गाजी ने अपने 5 सेनापतियों को घोड़ों के मार्कर बनाकर इसी कुशपुर में भर राजा शिवेंद्र के किले में प्रवेश कराकर निमंत्रण करवा दिया था। जिससे घोड़ों के मुस्लिम व्यापारियो से हमेशा खतरा बना रहता था। अल्लाउद्दीन खिलजी नन्द कुँवर के इस कृत्य (व्यापारियों की हत्या) को सुनकर आगबबूला हो गया और नन्द कुँवर को सजा देने के लिए एक विशाल सेना के साथ दिल्ली से कुशभवनपुर के लिए चल पड़ा। वर्तमान सुल्तानपुर के पश्चिमवर्ती दिशा में करौंदिया के जंगल में गोमती के दूसरे छोर पर पड़ाव डाला गया। (सुल्तानपुर गजेटियर पेज 26 ले डी पी वरुण) जब सुल्तान के गुप्तचरों ने समाचार के वीरता और अदम्य साहस से सुल्तान को अवगत कराया तो सुल्तान का जोश ठण्डा पड़ गया, हिम्मत जवाब दे गई। लगभग 1 साल तक वहाँ करौंदी के जंगल में पड़ावते रहे। उसके गुप्तचर दिन रात कुशभवनपुर में तिल तिल की जानकारी एकत्र करते रहे लेकिन परिणाम जस का प्रतिबिंब था। नन्द कुँवर एक शसक्त शासक थे। उनसे उलझना मौत को दावत देने के समान था। अंतर तो भर राजा नंद कुँवर की एक कमी मिल ही गयी। भर राजा नंद कुँवर लालची प्रवेशिति के थे। उनका लालची होना ही उनके राज्य के पतन का कारण बना। अल्लाउद्दीन ने षड़यंत्र द्वारा कूटनीति का सहारा लिया। भर राजा नंद कुँवर के पास शाँति और दोस्ती के प्रस्ताव के साथ, उन्हें पालकीयों में उपहार भेजा। (अर्क्योलजीक्लूस ऑफ इंडिया पेज 337, कनिंघम) शड़यंत्र के तहत नजराना के रूप में सैकडो पालकीओ में धन दौलत और उन्हीं पालकीओ में सैनिकों को (दासी वेश) में भेजा गया। भर राजा नंद कुँवर लालच में आ गए। पालकी जब नंद कुँवर के किले में पहुंची और पालकी खोली गयी तो उसमे से लड़ाकू तुर्क सैनिक हाथ में प्रतिभा लिए पालकी से कूद पड़े। (संदर्भ: -उपरोक्त पृष्ठ ३३)) अकस्मात इस आक्रमण से भर सैनिक भौचक्के हो गए। वे सभी निहत्थे थे। अतः अधिकांश भर सरदार और चोर सैनिक मारे गए। (संदर्भ: -सलतनत ए गजेटियर इलाहाबाद (1903) पृष्ठ 204, 205 लेखक एच आर नेविल) भर राजा नंद कुँवर पदच्युत कर दिया गया। अल्लाउद्दीन ने विजयोत्सव मनाया और वहाँ रिसॉर्ट्स की भूमि में ही पाँच आरोपरन का की मजार और एक मस्जिद का निर्माण कराया और कुशभवनपुर का नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया। इस घटना को इतिहासकार राजेश्वर सिंह समाचार दैनिक जनमोर्चा 15 अक्टूबर 2002 पेज 7 शीर्षक सुल्तानपुर इतिहास के आईने में "" इस प्रकार दर्शाया है। दिल्ली के बादशाह ने बदले की भावना से कुशपुर अभियान किया और गोमती के दूसरे किनारे पर डेरा डाल दिया। होली के दिन उपहार देने के बहाने पालकीओ में सेना उतार दिया। भयंकर युद्ध हुआ। युद्द में भर पराजित हुआ। कुश भवनपुर पर मुस्लिमो का आधिपत्य हो गया। सुल्तान ने कुशपुर का नाम बदलकर सुल्तानपुर दिया। ----- इतिहास में होली के दिन कई भर राजाओं ने अपना राज्य छोड़ दिया है क्योंकि होली के दिन पीने का प्रिय पेय पदार्थों का सेवन और उस दिन हथियार न उठाने का प्रचलन, हमेशा ही वे बाहरी पड़ा है। इसीलिए तो बुजुर्गो ने किसी के विषय में कहा है। भरकुल रीति सदा चली आयी चली । । राज्य जाना पर दारू न जायी ू । । किसने कहा कि शराब छोड़ो सर उसके सर को पहले फोडो ो । ।
11 वी शदी में धर्म प्रचार और लूट खसोट की नियत से जब सैयद सालार गद्दी गाजी ने हिन्दुओं की धर्म स्थली अयोध्या पर आक्रमण किया उसी समय उसकी एक सेनापति मो o बकर और मौला हज्जम की अपनी तुकणी के साथ कुश भवनपुर राज्य क्षेत्र में मारा गया। इसकी सूचना पाकर गाजी मिया आग बबूला हो गई। अपने 5 सेनापति जो आपस में सगे भाई थे। जो गजनी में लूट खसोट और डकैती करते थे। लूट खसोट और जेहाद के नाम पर गाजी के सेंना में भर्ती होकर भारत में आए थे। उन पांचों भाईओ को अपने स्वयं के वैधृत के साथ कुशभवनपुर जहाँ के शासक भर राजा शिवेंद्र और राजकुमार सिंहवन थे, कोतरास्त द्वारा वहाँ मुस्लिम धर्म का परचम लहराने के लिए भेजा गया। पांचों भाई सैयद अपने स्वयं के वैधृत के साथ अंगधेरे में कुशभवनपुर के लिए प्रस्थान किए। जब यह सैन्य टुकड़ी जंगल में खंडहर से गुजर रही थी। केवल खंडहर से एक कर्कश स्वर सुनाई दिया। स्वर: - ठहरो बड़ा सैयद: --रोकने वाला कौन है? सामने आ। पुनः कर्कश स्वर: _-- मै तुम्हारा रहबर, मुझे तुम्हारी मदद के लिए भेजा गया है। बड़ा सैयद: - आप फ़रिश्ते हैं तो संकेत देते हैं कि हम कौन हैं? और कहाँ जा रहे हैं?
7 "" "" "" "" "" "" "" "" उसी तरह की आवाज: - आप पांचों भाई सैय्यद सालगिरह का गाना के सिपहसालार हैं, कुशपुर विजय पर जा रहे हैं। सुनकर सभी श्रद्धा से नतमस्तक हो गए। फिर से आवाज: --- शरीर को घोड़ों का बड़ा शौक है। दो भाई सैयद घोड़ों के मार्कर बनकर घोड़ों के साथ कुशपुर में मुख्य द्वार से प्रवेश करें। अंदर की सारी स्थिति का जायजा बारे में द्वारपालो का कटलल फाटक खोल दें। उसी समय शेष सेना कुशपुर पर आक्रमण कर देगी और कुशपुर विजय हो जाएगी फरिश्ते के सुझाव ने पांचों भाई सैयद के उत्साह में चार चाँद लगा दिए। यह देवी आवाज राजकुमारी बुललारी (जो (बाद में महाराजा सुहेलदेव राजभर की रानी बनी) की थी। जिसे अयोध्या के योगी महेश्वरा नंद जी ने कुशपुर के राज्य के मदद के लिए भेजा था। राज राज कन्या बल्लारी उन्हीं की शिष्या थी। तुर्क सैनिक आगे बढ़ गए। गया। एक सांकेतिक स्वर हटते ही बल्लरी का घोड़ा उपस्थित हो गया। युवती बड़ी सवारी से घोड़े पर सवार होकर तुर्को के पहले ही कुशपुर पहुंच गयी। भर राजा शिवेंद्र और राजकुमार सिंहवन से मिलकर तुर्को के निमंत्रण की योजना से अवगत कराया और अपनी योजना भी बनाई। बताई। कुशगढ़ी के गुप्तचर, सैनिक, द्वारपाल, सभी सावधान हो गए। योजन के रूप में तुर्क सेना कुशगढ़ी के एक कोस पूर्व ही रुक गयी। बड़ा भाई सैयद व उसका एक भाई अपने तीन भाइयोंओं के साथ अपने 50 सर्वश्रेष्ठ नस्ल के घोड़ों के बारे में चरित्र के रूप में कुशाग्र गिरीचे के पास। सभी द्वारपाल जग रहे थे। लेकिन सोने का नाटक कर रहे थे। बार बार जगाने के बाद बड़ी मुश्किल से एक द्वारपाल जागा। बड़ा सैयद बोला: -हम घोड़े के मार्कर हैं। हम घोड़ों को लेकर यदि उत्तर उत्तरगे तो तुर्क हमारे घोड़ों को छीन लेंगे। बाहर सोने पर डाकुओं से जानमाल का खतरा है। हम घोड़ों को राजा के हाथ बेचना चाहते हैं। द्वारपाल ने दरवाजा खोलने से मना कर दिया। दूसरा द्वारपाल बड़े सैयद के काफी अनुनय विनय से प्रभावित होकर एक घोड़ा उसे मुफ्त देने की शर्त पर दक्षिणी गेट से अंदर प्रवेश करने देने का आश्वासन दिया। पूर्व योजन के रूप में दक्षिणी गेट खोल दिया गया। मार्कर और उनके सहचर घोड़ों सहित गढ़ी में प्रवेश कर गए। सहसा दरवजा बंद हो गया और मार्कर भर सैनिकों द्वारा घेर लिए गए। बड़ा सैयद चिल्लाया: -_ धोखा '' 'राजकुमारी राजकुमारी बल्लारी: - तुर्को ने हमेशा धोखे के हथियारों से हिंदू राजाओं को राष्ट्रस्त किया है। मुस्लिम समुदाय ने बनाया, उनकी धन संपदा लूट ली। उनके सामने ही उनकी बहन व बेटियो की इज्जत तार तार की है। आज उसी हथियार से हम भी पेश आए हैं। दोनों सैयद भाई व तीनो सहचर पांचों को वध स्थल पर लाकर वध कर दिया गया। बड़े भाई सैयद का कपड़ा उतारकर एक भर सैनिक ने पहन लिया। ऐसे झाड़ ने बनाया कि बड़ा सैयद ही लग रहा था। भर सैनिक ने राजकुमारी बुलरी के योजन के अनुसार रात के अंधेरे का लाभ उठाकर तुर्क सैनिकों के करीब पहुंच और सारी योजना बताई। गढ़ी के अंदर के रक्षक रात में ही सोते में मार दिए गए हैं। दक्षिण का गेट खोल दिया गया हैं। हमारे सुरक्षित सैनिक 1 जीव छिप कर रहेंगे। सैयद तीनो भाई अपनी अपनी टुकड़ी के साथ प्रस्थान किए। 50 सुरक्षित सैनिक बाहर छोड़ दिए गए शेष गढ़ी के अंदर प्रवेश कर गए। दो भाई सैयद व सैनिको के अंदर प्रवेश करते ही दक्षिणी गेट बंद कर दिया गया। तुर्क सैनिक बनचूस रह गए। गौमती नदी के पक्ष से नावों के अंदर से बाणों की वर्षा, और ओरिएब से भर सैनिकों का आक्रमण तेज हो गया। सहसा गढ़ी का मुख्य दरवाजा खुला। शेष सैयद भाई और सैनिक गढ़ी में प्रवेश किए। भर सैनिक दुश्मनों को सामने देखते ही भूके शेर की तरह दुश्मन पर टूट पड़ते हैं। बहुत कम प्रयास में ही तीनो सैयद भाई और उनकी सेना कुशपुर गढ़ी में मौत के घाट उतार दी गयी। राजकुमारी बुलरी के अदम्य साहस और चातुर्य से महज 2 हजार भर सैनिकों ने 5 हजार तुर्क सैनिक और पांचों भाई सैयद कोगनर मूली की तरह काट डाला। कुशपुर में विजयोत्सव मनाया गया। अयोध्या के योगी महेश्वरानंद की शिष्या राजकुमारी बल्लारी का चतुर्दिक यशोगान होने लगा। उपस्थित जन मानस के प्रमुख से बल्लारी के योगदान की भूरि भूरि प्रशंसा हो रही थी। भर राजा शिवेंद्र के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होने राजकुमारी बुललरी के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित की। 14 वी शदी के पूर्वार्द्ध में अल्लाउद्दीन खिलजी ने कुशपुर / कुशभवनपुर के भर राजा नन्द कुँवर को दशस्त किया। को को कुशभवनपुर से खदेरे जाने के कारण घर से बेघर दर दर भटकती हुई यह जाति बंजारा जाति की तरह जीने को विवश हो गई है। खिलजी ने सन 1033 ई में मारे गये पांचों भाई सैयद को शहीद का दर्जा दिया और उनकी मजार बनवाकर उनके मजार पर मेला लगवाकर उन्हें सम्मानित किया। वह पाँचों भाई सैयद आगे चलकर पाँचों पीरन के नाम से जाने चला गया। लेकिन दुर्भाग्य से उस देश, धर्म, संस्कृति और नारियों की रक्षा करने वाली और दुर्दांत तुर्को को छठी का दूध याद करनाकर उनकी इहलीला समाप्त करने वाली शक्ति स्वरूपा राजकुमारी बल्लारी को हिंदू समुदाय नें हमेशा हमेशा के लिए विदित कर दिया। (संदर्भ ग्रन्थ: -उपरोक्त घटना पुस्तक भले सुल्तान लेखक यदुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव से लिया गया है) लेखक राम चन्द्र राव गोरखपुर संस्कृति एवं नारियों की रक्षा करने वाली और दुर्दंत तुर्को को छठी का दूध याद करनाकर उनकी इहलीला समाप्त करने वाली शक्ति स्वरूपा राजकुमारी बुललारी को हिंदू समुदाय नें हमेशा हमेशा के लिए विस्मृत कर दिया। (संदर्भ ग्रन्थ: -उपरोक्त घटना पुस्तक भले सुल्तान लेखक यदुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव से लिया गया है) लेखक राम चन्द्र राव गोरखपुर संस्कृति और नारियों की रक्षा करने वाली और दुर्दंत तुर्को को छठी का दूध याद करनाकर उनकी इहलीला समाप्त करने वाली शक्ति स्वरूपा राजकुमारी बुललारी को हिंदू समुदाय नें हमेशा हमेशा के लिए विस्मृत कर दिया। (संदर्भ ग्रन्थ: -उपरोक्त घटना पुस्तक भले ही सुल्तान लेखक यदुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव से लिया गया है) लेखक राम चन्द्र राव गोरखपुर
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