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Naga (dynasty )

  Nagas of Padmavati Language Watch Edit The  Naga  ( IAST : Nāga) dynasty ruled parts of north-central India during the 3rd and the 4th centuries, after the decline of the  Kushan Empire  and before the rise of the  Gupta Empire . Its capital was located at  Padmavati , which is identified with modern Pawaya in  Madhya Pradesh . Modern historians identify it with the family that is called  Bharashiva (IAST: Bhāraśiva) in the records of the  Vakataka dynasty .The Naga Empire was matriarchal. The king's eldest son-in-law would be the emperor of this empire it was their tradition. For example, Virsena, the prince of the  Vakataka dynasty , became the king of this empire. Nagas of Padmavati early 3rd century–mid-4th century Status Empire Capital Padmavati Common languages Sanskrit Prakrit Religion Hinduism Government Monarchy Maharaja   History   • Established early 3rd century • Disestablished mid-4th century ...
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वीर पुत्र राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहेलदेव

 वीर / पुत्र 卐वीरभारशिव भर क्षत्रिय महाराजा सुहेलदेव राजभर卐 वीरभारशिव ( भर ) क्षत्रिय  राष्ट्र रक्षक वीर शिरोमणि चक्रवर्ती सम्राट महाराजा सुहेलदेव राजभर जी का पराक्रम गाथा। हिन्दू राष्ट्र रक्षक वीर शिरोमणि श्रावस्ती सम्राट चक्रवर्ती महाराजा सुहेलदेव राजभर जी का इतिहास भारत देश गौरवपूर्ण एवं साहसपूर्ण , देशभक्त के रूप में अमर रहा है। जिसे हिन्दुस्तान मे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। महमूद गजनवी भारतदेश को लुटने की दृष्टि से 1001ई0 से लेकर 1025 ई0 तक  17 बार आक्रमण किया।एवं मथुरा, थानसेर, कन्नौज , व सोमनाथ के अति समृद्धशाली मंदिरों को तोड़ने एवं लुटने मे सफल रहा। सोमनाथ मंदिर को लुटने मे महमूद गजनवी का भांजे सैय्यद सालार मसूद  ने भी भाग लिया था। महमूद गजनवी की मृत्यु 1030 ई0 के बाद महमूद  गजनवी के भान्जे सैयद सालार मसूद ने उत्तर भारत में इस्लाम का विस्तार करने एवं हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली थी।  लेकिन 10 जून 1034 ई0 को बहराइच के युद्ध में महाराजा सुहेलदेव राजभर के हाथों से सैय्यद सालार मसूद गाजी मारा गया।  इस्लामी सेना की इस पर...

Bhar rajputana

 हे क्षत्रिय! उठ! अपनी निँद्रा को त्याग। ले इस नये रण संग्राम मे भाग, भरकर अपनी भुजाओँ मेँ दम, मिटा दे लोगोँ के भ्रम। देख आज तू क्योँ है? अपने कर्तव्योँ से दुर! कर विप्लव का फिर शंखनाद, उठा तेरी काया मे फिर रक्त का ज्वार! हे क्षत्रिय! उठ! अपनी निँद्रा को त्याग, देख शिखाओँ को, उनसे उठ रहा है धुआँ, उठ खडा हो फिर ‘अक्षय’ तू, कर दुष्टोँ का संहार, नीति के रक्षणार्थ बन तू पार्थ!, हे क्षत्रिय! उठ! अपनी निँद्रा को त्याग। कर विप्लव का फिर शंखनाद, याद कर अपने पुरखोँ के बलिदान को, चल उन्ही के पथ पर, कर निर्माण एक नया इतिहास, जिन्होने दिए तुम्हारे लिए प्राण, कुछ कर कार्य ऐसा कि बढे उनका सम्मान हे क्षत्रिय! उठ! अपनी निँद्रा को त्याग। ‘अक्षय’ खडा इस मोड पर,रहा है तुझे पुकार, करा उसे अपने अंदर के, एक क्षत्रिय का साक्षात्कार! हे क्षत्रिय! उठ! अपनी निँद्रा को त्याग। जय भर राजपुताना    जय भवानी

राज कलश

 स्वर्गीय अमर बहादुर सिंह "अमरेश" ने अपनी पुस्तक राज कलश एवं समाचार पत्र स्वतंत्र भारत 16 अक्टूबर सन 1966 में उल्लेख किया है कि- मध्य भारत में जहां भी  पहुंचिए भार शिवो(भरो) का कोई ना कोई भग्नावशेष मिल ही जाएगा. कहीं दुर्ग हैं, कहीं टीले हैं, कहीं खंडहर है तो कहीं देवस्थान हैं. लगता यही है कि मुगल शासकों को छोड़कर सबसे अधिक भग्नावशेष किसी राजवंश के प्राप्त होते हैं तो वह केवल भरो के हैं  इन मुर्दा टीलो, दुर्गों, खंडहरों और देव स्थानों की भग्न प्रतिमाओं में कितनी महत्वपूर्ण सामग्री जो ऐतिहासिक है छिपी है इसका अनुमान लगाना कठिन है. गांव-गांव में भार  शिवो( भरो) के स्मृति चिन्ह इसके साक्षी है कि मध्य भारत में इनका कितना व्यापक और सुदृढ़ साम्राज्य : था. इन टीलों में एक विशेष प्रकार की ईटों, बर्तनों के टुकड़े और राख के ढेरों में दुर्लभ पुरातत्व छिपा है सन 1976 ईस्वी में रायबरेली जिले के सलोन तहसील के अंतर्गत एक छोटे से गांव डीहवा के टीले कि जब परगना अधिकारी श्री अमिय चतुर्वेदी की मौजूदगी में खुदाई हुई तो उसमें ऐसे नक्काशी दार बर्तन टुकड़े नीव आदि मिले जो भरो के माने गए है...

राजभर राजा शिव शरण मझौली

 मझौली राज में #राजभरो का शाषन पढ़े और शेयर करें जय भवानी जय भर राजपुताना,🚩🚩🗡️🗡️ भारशिव नागवंशी क्षत्रिय इतिहास  गोरखपुर से 107 किलोमीटर दूर सलेमपुर से भाटपार जाने वाली रोड पर नदावर घाट के बाद मझौली राज स्थित है , पहले नदी नाव से पार् करके ही मझौली राज जाना पड़ता था . १९७७ में जब जनता पार्टी के राज्य में मुख्य मंत्री राम नरेश यादव हुए , तो इस पूल का उद्घाटन किये थे. आज कल मझौली राज टाउन एरिया है , जो इतिहास में कभी यहां राजा बलभद्र नारायण मल्ल और उनके पूर्वजों का राजपाट हुआ करता था। राजा का महल और उनके पूर्वज आज भी यहां रहते हैं। इस राज परिवार द्वारा बसाया गया था मझौली राज कस्बा। यह कस्बा तीन तरफ से नदियों से घिरा है। भगवान राम के घर और ससुराल के बीच में है मझौली राज स्थित है . यहीं पास में ही सोहनाग में भगवान परशुराम का धाम स्थित है . इतिहासकार डॉ. दान पाल सिंह के अनुसार विशेन वाटिका में उल्लेख है कि अयोध्या के राजा मर्यादा पुरुषोत्तम राम के समय में इस स्थान का नाम इतिहास में मध्यवलिया मिलता है। इसे मध्यवलिया इसलिए कहा जाता था कि क्योंकि जनकपुर (पटना, बिहार) स्थित माता जानक...

शैव धर्म प्राचीन हिंदू संस्कृत

  शिव से संबंद्ध धर्म को   शैव  कहा जाता है, जिसमें शिव को इष्टदेव मानकर उनकी उपासना किये जाने का विधान है। शिव के उपासक शैव कहे जाते हैं। शिव तथा उनसे संबंधित धर्म की प्राचीनता   प्रागैतिहासिक युग  तक जाती है।   सैन्धव सभ्यता   की खुदाईमें   मोहनजोदङो  से एक मुद्रा पर पद्मासन में विराजमान एक योगी का चित्र मिलता है। उसके सिर पर त्रिशूल जैसा आभूषण तथा तीन मुख हैं।   सर जॉन मार्शल   ने इस देवता की पहचान ऐतिहासिक काल के शिव से स्थापित की है। अनेक स्थलों से कई शिवलिंग भी प्राप्त होते हैं। इससे सूचित होता है, कि यह भारत का   प्राचीनतम धर्म  था। ऋग्वेद  में शिव को  रुद्र  कहा गया है, जो अपनी उग्रता के लिये प्रख्यात हैं। क्रुद्ध होने पर वे मानव तथा पशु जाति का संहार करते थे अथवा माहमारी फैला देते थे। अतः  ऋग्वैदिक काल  में रुद्र की उपासना उनके क्रोध से बचने के लिये निमित्त किया करते थे।वस्तुतः रुद्र में विनाशकारी तथा मंगलकारी दोनों ही प्रकार की शक्तियाँ निहित थी। बताया गया है, कि न मानने वाले मनुष्यों को ...