भारशिव नागवंश सम्राट भर राजा रुद्रमल (11 वी शदी) रुदौली बाराबंकी
जिला बाराबंकी से फैज़ाबाद मार्ग पर लगभग 38 कि.मी. की दूरी पर तहसील रामसनेही घाट के अंतर्गत रोड के दाहिने भर राजा रूद्रमल का किला था।] आज भी इसके खंडहर देखे जा सकते हैं भर राजा रूद्रमल के नाम पर ही इस शहर का नाम रुधौली पड़ा है। कुछ विद्वानों का मत है कि भर शासक रुद्रमल रूद्र (शिव) के उपासक थे और उन्होने यहाँ पर एक भगवान रुद्र (शिव) का एक भव्य मंदिर बनवाया था ।जहाँ राज परिवार के साथ साथ क्षेत्रिय जनता भी पूजा-पाठन करती थी। अतः भगवान रूद्र (शिव) के नाम पर इस स्थान का नाम रुद्रौली पड़ा। जो कालांतर में रुदौली कहलाया। गजेटियर आफ प्रिन्िन्श आफ अवध (1877) के वेलूम 3 पेज 274 के अनुसार भर राजा रुद्रमल ने इस शहर को बसाया था इसलिए इस शहर का नाम रुदौली पड़ा।भर राजा रुद्रमल का राज्य भी मुस्लिम आक्रांताओं का शिकार हो गया। इस राज्य के पतन की घटना इस प्रकार की है । ! सैयद हालुनुदीन और सै। सजलूदीन दो भाई अरब से भारत आए। और कस्बा रुदौली में बस गए। दोनों ने विस्तारबादी नीति आपाना शुरू की और धर्म परिवर्तन के लिए हिन्दुओं को उकसाने लगे। ये दोनों भारतीय राजाओं की गोपनीयता की जानकारी मुस्लिम शासको को देते थे ।थाथा इसका आँकलन करके महमूद गजनवी को निमंत्रण के लिय आमंत्रित करते थे। राजा रुद्रमल के गुप्तचरों ने इन दोनों के षड़यंत्र का पर्दाफाश करते हुए राजा को चेतावनी दी। राजा रूद्रमल ने इन दोनों को अपने राज्य से बाहर करने के लिए प्रस्ताव बनाना शुरू किया। ये दोनों के कारगुजारी का पता राजा को हो गया है। यह जानकर भयभीत हो गया।अतः अपने जीवन माल की रक्षा हेतु गजनी देश के सुल्तान महमूद गजनवी के शरण में गये। इस घटना को पुस्तक मीराते मस के सीएन पृष्ठ 43-44 लेखक अब्दुर्रहमान चिश्ती ने इस प्रकार उल्लेख किया है - सै। अरुकुनुदीन और जमालुद्दीन (अरब) हिन्दुस्तान के कस्बा तडौली से सम्पूर्ण फरियादी बादशाह गजनवी के दरबार में पहुंचते हैं। वहां उनकी फरियाद सुनी नहीं गई। वे दोनों वहाँ जमा हो जाते हैं। उसमे कुछ ढूढने लगे दरबारियों ने उनसे पूछा कि यह छेद क्या है? दोनों ने बताया कि हम लोग इस राख में बादशाह को तलाश रहे हैं। इसकी सूचना बादशाह को हुई। बादशाह ने दोनों फरियादियों को दरबार में बुलाया। हसन मेहदी ने दोनों को बादशाह से मुलाकात करवाया।बादशाह के पूछने पर दोनों ने बताया कि हम लोग हिंदुस्तान के कस्बा रुदौली में रहते हैं ।वन चारो ओर हिंदू हिंदू हैं। वहाँ का राजा हम लोगों को मार डालना चाहता है वहाँ इस्लाम खतरे में है हम लोग कहाँ जाते हैं अब आप का ही सहारा है। खुदा के वास्ते आप हम लोगों को बचाए। महमूद गजनवी ने कहा कि आप लोग शिकनता मत करो हम आपकी रक्षा करेंगे। दूसरे दीन बादशाह गजनवी ने सैयद सालार मसूद गाजी और रज्जब सालार को विशाल सैन्य टुकड़ी के साथ रुधौली भेजा। हुक्म की तामील हुई दोनों ने अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ हिन्दुस्तान के रुधौली के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँच कर अकस्मात आक्रमण कर दिया। भर राजा रूद्रमल इस आकस्मिक आक्रमण से भौचक्के हो गए। लड़ाई की कोई तैयारी नहीं थी अतः बड़ा घमासान युद्ध हुआ लेकिन महाराजा रूद्र मल युद्ध में प्राप्त हुए और इस्लाम का कब्जा हो गया। सैयद सालार मसूद गाजी ने दोनों फरियादियों से हालुनुदीन और जामलुदीन को। वहाँ का राज्य सौंप दिया और कुछ दिन वहाँ रुक कर गजनी को चला गया।इस प्रकार भर राजा रुदौली का पतन हो गया। नोट: -उपरोक्त में कामुद्दीन के स्थान पर जमालुदय पढ़ा जाए। विशेष: -ध्यान रहे कि ये वही फरियादी सै जमा लुडे हैं पुत्री जौहरा बेगम से सै सालार मसौद गाजी का रुदौली प्रवास के समय प्रेम हो गया था । गाजी जौहरा बेग़म से शादी करना चाहता था । पुनः सै सालार गाजी दूसरी बार गजनी से विशाल सेना के साथ जेहाद और लूटपाट के लिए अवध क्षेत्र में आया तो उस समय रुधौली भी गया वहीं प्रवास के समय ही उसकी शादी का दिन भी निश्चित हो गया था । परन्तु दुर्भाग्य से सै .सालार मसौद गाजी का भांजा रज्जब सालार हठीला का बहराइच के राजाओं से युध्द ठन गया और सै सालार मसौद गाजी को बहराइच जना पड़ गया जहाँ लड़ाई में महाराजा सुहेलदेव राजभर के हाथों मारा गया । गाजी और जौहरा बेगम के शादी का ख्वाब ख्वाब ही रह गया । बाद में जौहरा बेगम ने गाजी के मजार पर जाकर प्राण त्याग दिया । आज भी जमालुदिन के वंशज रुदौली से बहराइच गाजी के मजार पर पीढ़ा और शादी का समान लेकर मजार पर शादी की रस्म अदायगी के लिया आते हैं और शादी नहीं हॊती है और वे वापस चले जाते हैं ।
लेखक
रामचंद्र राव गोरखपुर9453303481
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