भर राजा त्रिलोक चंद
लेखक रामचंद्र राव राजभर भारतीय इतिहास में नामधारी राजाओं को लेकर Bais Bhar और pasi समाज में उनके इतिहास की लूट मची हुई है।
कुछ समाज के ऊपर से भलेही क्रिमिनल ऐक्ट हटा दिया गया है और वे सुधर भी गए हैं। लेकिन उनके इतिहासकार और कुछ लोगों में इतिहास लूटने की एक नई अंतरर्ति ने जन्म ले लिया है। उनमें यह प्ररावती उत्तपन्न होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि अधिक उन्होने इन राजाओं के विषय में गहन और तुलनात्मक अध्ययन न किया हो। मेरा ये विवादों को सुलझाने का यह एक छोटा प्रयास है। मेरे संज्ञान में उत्तर प्रदेश के इतिहास में 5 त्रिलोक चंद राजाओं का उल्लेख मिलता है। पृष्ठ उनका अवलोकन करें और चिंतन कर विवाद से दूर। अपने अमूल्य ऊर्जा को विवाद में नहीं, विकास में लगाया। (अ) बैस क्षत्रियों के प्रथम पुरुष और उनके वंशावली "" "" '' '' '' '' '' '' '' '' '' ''-अभयचंद द्वितीय (शेक 1112) ४२: -करण राय ४३: -जगत राय ४४: -भगत राय ४५: -गटमदेव ४६: -झुन्नु झुंगा राय ४ :: -बेरबल राय ४ :: -अय्यर ४ ९: -अधिकार प्राधिकरण संतान) 50: -त्रिलोक चंद II (15 वी शदी) संदर्भ ग्रन्थ: -a: - यू पी गजेटियर लखनऊ सोयम 37 पेज 29 ले .विनोद चंद शर्मा (बी) यू पी जिला गजेटियर उन्नाव 25 25 .अमर सिंघ बघेल (सी)। ): - भाले सुल्तान का इतिहास और शेजरा पृष्ठ १२ ले। हवलदार रन बहादुर सिंघ के अनुसार त्रिलोक चंद द्वितीय का शासन काल 1354--1406 ई रहा है। यही त्रिलोक चंदी बैस कहलाये। नहीं: --_ त्रिलोक चंद द्वितीय को ही पासी समाज के इतिहासकार पासी मानते हैं। 51: _--- विदारदेव (विददेव) केवल भले ही सुलेतान कहलाये और इन्ही से भाले सुल्तान शाखा चल पड़ी। 52: _-- राय विदरदेव संदर्भ ग्रन्थ: - क्रमांक 1 से 52 तक वंशावली (केवल नाम) क्षत्रिय वंशारवण पृष्ठ 374 से 377 Le )। सूबेदार भगवानदीन सिंघ पर आधारित है।वंशावली के क्रमांक 50 पर अंकित त्रिलोक चंद द्वितीय के विषय में अनुकूलन ग्रन्थों का उल्लेख मेरे द्वारा किया गया है। [२ ९ / [, 29:३१ बजे] रामचंदर राजभर: "-2-- (बी) पासी वंश के त्रिलोक चंद (१४६०-) -_१४ai०ई) तिलोई, राय बरेली" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" आप "" "" "" "" "" "" "", "" "", "" "", "" "" "" "" "" "" "" "", तिलोई राय बरेली ---------__- संदर्भ ग्रन्थ: _- पासी समाज दर्पण पृष्ठ - - ले .राम प्रकाश सरज पर। --राम प्रकाश सरोज जी ने उपरोक्त त्रिलोक चंद के पासी होने के साक्छ में कोई ग्रन्थ आरक्षित नहीं किया है। पासी वंश के उपरोक्त त्रिलोक चंद और बैस राजपूत के त्रिलोक चंद दोनों के पिता का नाम सातन होने के कारण विवाद उत्तपन्न हो गया है।राय बरेली यार्डेटियर के पैरा 2 पेज 23 का उल्लेख करते हुए इतिहासकार बलवंत राय (पासी) ने अपने ग्रन्थ चरमराती सामाजिक व्यवस्था पृष्ठ 93 पर लिखा है कि तिलोई के राजा त्रिलोक चंद के पिता का नाम सातन नहीं था। (स) वत्स गोत्रीय त्रिलोक चंद एस / ० जय चंद (१५२ १५ से १५ ई ० ई) नखलगढ़ सुल्तानपुर "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" संदर्भ : -अवध गजेटियर (1877) वेलुम वन पृष्ठ 29 नोट:-इन्ही त्रिलोक चंद को बाबर ने मुस्लिम बनाकर उनका नाम तांतरख़ाँ रख दिया और हसनपुर व कुड़वार का शासक घोषित किया था (द) भर वंशीय त्रिलोक चंद (918 ई) बहिष्कार "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""। "" "" "" "" "" "संदर्भ ग्रन्थ: -" ": - - गीतेयर ऑफ द प्रडिन्स ऑफ अवध (1877) वेलुम 2 पेज 354 2: -रिपोर्ट ऑफ द लंड रेवेन्यू सटाइलमेक्ट ऑफ द लखनऊ डिस्ट्रिक (1873) पेज 23 ले। एच। एच। भट्ट नोट: --- उपरोक्त दोनों स्पष्ट ग्रन्थों में त्रिलोक चंद (918 ई) के बाद की 9 पीढ़ीओ तक उनके वंशजो ने 1093 तक शासन किया। अंतिम राजा गोविंद चंद की विधवा रानी भीम देवी ने जीवन से निराश होकर अपना राज्य अपने गुरु हरगोविंद को सौंप दिया। नोट:(1): - लेखक ।R के चौधरी बिना कोई साक्छ्या प्रस्तुत किए गए अपने ग्रन्थ पासी समाज पेज 32 पर लिखते हैं कि त्रिलोक चंद (918 ई) निष्कर्साई पासी थे। (2): - अवध गजेटियर (1877) वेलुम 2 पृष्ठ 354 पर स्पष्ट लिखा है कि त्रिलोक चंद (918 ई) भर वंशीय थे ।परंतु लेखक के के रावत (पासी) ने अपने ग्रन्थ: -अवध विलीकरण के पूर्व पृष्ठ 24 पर साक्छ्याया। प्रस्तुत किया गया। गजेटियर में ही भर के स्थान पर भर पासी लिखकर त्रिलोक चंद को पासी लिखा है। 3 पा शब्दरूपन घुसा कर पुनः खत्म कर देने वाले इस संधि विचे को कक्षा 5 का छात्र भी स्वीकार नहीं करेगा। बलवंत राय (पासी) ने अपने ग्रन्थ चरमराती सामाजिक व्यवस्था पृष्ठ 93 पर त्रिलोक चंद को भारशिव लिखकर एक अदभूत संधि विदाई का नमूना पेश करते हुए भारशिव ** भर प्लस पाशिव लिखकर त्रिलोक चंद को भरपासी लिखा है।पा शब्दरूपन घुसा कर पुनः खत्म कर देने वाले इस संधि विचे को कक्षा 5 का छात्र भी स्वीकार नहीं करेगा।
(३) ४: -बस क्षत्रिय भी त्रिलोक चंद (९ १ को ई) को बैस क्षत्रिय होने का दावा है। लेकिन उन्होने अपनी वंशावली के अलावा कोई ठोस सबूत नहीं दिया है। उन्होने त्रिलोक चंद प्रथम (523 --- 588 ई) और त्रिलोक चंद (918 ई) के शासन काल का ध्यान नहीं दिया गया है ग्रनाथ-लुस्खा अवध & ग्रंथ बख़ुला तारिख और ग्रन्थि बधाई (1943 विक्रमी) (लेखक लाला संगत प्रसाद सतेह देवी) के आधार पर। लिखित गया ग्रंथ फ़्राइच जनपद का खोजपूर्ण इतिहास पृष्ठ 55 लेखक कन्हैयालाल श्रीवास्तव ने बैस वंशीय त्रिलोक चंद के वंशावली का उल्लेख अपने ग्रन्थ में किया है। 1: --- त्रिलोक चंद (523 से 588 ई) 2: -विक्रम चंद (588--611 ई) 3: -कार्तिक चंद (611--616 ई) 4: -राम चंद (616-631 ई) 5: -अधार चंद (६३१-६४ ९ईआई) ६: -कल्याण शाह (६४ ९ -६६५ई)-: -भीम चंद (६६५--६ई१ )ई)-: -कोह चंद (६ ---१ --- ई० --- ई) ९: -गोविंद चंद (8०8) 730 ई) 10: -जेटियरियर ऑफ द प्रिन्सिन्स ऑफ अवध (1877) वेलुम 2 पेज 354 और रिपोर्ट ऑफ द लैन्ड रेवेन्यू सटिल्मेण्ट ऑफ द लखनऊ डिस्ट्रिक्ट (1873) पेज 23 लेखक एच एच बट्ट के अनुसार भरवाई त्रिलोक चंद (918 ई) ने एक्साइच में शासन किया। उनके बाद उनकी 9 पीढ़ी ने 1093 ई तक शासन किया। अंतिम शासक गोविंद चंद की विधवा रानी भीम देवी ने जीवन से निराश होकर अपना राज्य अपने गुरु हरगोविंद को सौंप दिया। 3: - त्रिलोक चंद (918 ई) जिनके वंशावली के 2 शासकों गोविंद चंद और भीम देवी को भी बैस वंशावली में स्थान नहीं दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि बैस वंशावली में कुछ तो गड़ बड़ है। अवध गजेटियर (1877) क्लास 3 पेज (242) मे दर्शाए गए बैस वंशावली से क्षत्रिय वंशाणव से बैस वंशावली से कोई तालमेल नहीं है साल वाहन से 25 वी पीढी पर त्रिलोकानंद s / o प्रताप शाह दर्शाया गया है शालीवाहन के भाई जसधर के 22 वी वी। पीढ़ी पर त्रिलोकचंद एस / ओ --त्रिलोक चंद (918 ई) जिनके वंशावली के 2 शासकों गोविंद चंद और भीम देवी को भी बैस वंशावली में स्थान नहीं दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि बैस वंशावली में कुछ तो गड़ बड़ है। अवध गजेटियर (1877) क्लास 3 पेज (242) मे दर्शाए गए बैस वंशावली से क्षत्रिय वंशाणव से बैस वंशावली से कोई तालमेल नहीं है साल वाहन से 25 वी पीढी पर त्रिलोकानंद s / o प्रताप शाह दर्शाया गया है शालीवाहन के भाई जसधर के 22 वी वी। पीढ़ी पर त्रिलोकचंद एस / ओ
सातन दर्शाया गया है जबकि क्षत्रिय वंशाणव में तिलोकचंद पहली 22 वीं पीढ़ी में उसी वंश के 50 वी पीढी में पीढ़ी पर तिलोकचंद s / o सातन दर्शाया गया है निष्कर्ष: --तुलमिक अध्ययन करने का ऐसा लगता है कि यह इतिहास नहीं बल्कि कपोल कल्पित भानमती मा है। पिटारा है ऐसे ही अवसरों पर इतिहासकारों के ढोल के पोल खुल जाते हैं। भारतीय दूषितता के इतिहासकारों नें निजी नीतियों के लिए भारतीय इतिहास को दूषित करने में कोई कौर बढ़ने नहीं छोड़ा है। rcrao.gkh
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